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अब और नहीं by Khwabi gaurav

अब और नहीं

रंगीन रातें, ख़्वाब गहरे अब और नहीं,

बारिशें, महफिलें खुश करें अब और नहीं।

भिखारी का भला चाह ले भिखारी मगर,

ये सरकारें भला चाहे अब और नहीं।

परिंदों ने समझ ली है सियासत बाज की,

वो जाल में फंस जाएं अब और नहीं।

भरोसा बंदरों पे कर लो एक बार को मगर,

हंसते मदारी पर भरोसा अब और नहीं।

वह वादे जो कागज पर सुनहरे लगते थे,

उन वादों की यादें बने अब और नहीं।

तुम्हारी याद के साए में जो कटती थी रातें,

वो रातें अश्क़ बहाएं अब और नहीं।

बच्चों की खातिर जो खुद को भूल बैठी हैं,

वो माएं दुख सहें अब और नहीं।

बहुत जी लिए 'ख़्वाबी' बंद आंखों से हम,

खुली आंखों को धोखा दें अब और नहीं।

~ख़्वाबी गौरव




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