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जो सच कहने से रोके ये ज़माना by khwabi gaurav

जो सच कहने से रोके ये ज़माना

तीन लफ्ज़ न सही तो कहावत ही सही,

तू इश्क़ तो कर चाहे सियासत ही सही।

हर हाल में मिलना ही चाहिए यहां इंसाफ़,

अदालत से नहीं तो बग़ावत ही सही।

मिटाने जो चले आबरू बहनों की,

जलेंगी चिताएं फिर दहशत ही सही।

मां भी हक़दार है खुशियों की यारों,

उसके हाथों में अब ये हुक़ूमत ही सही।

ग़लत को ग़लत कहने से रोकेगा कौन मुझे,

शराफ़त को शराफ़त फिर क़यामत ही सही।

जो सच कहने से रोके ये ज़माना 'ख़्वाबी',

इस ज़माने से हमारी अब रुख़सत ही सही।

~ख़्वाबी गौरव






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