स्त्री की कहानी
स्त्रियों की खोज हुई, जवां हुआ जब मर्द है
दहेज लिया फिर स्त्री, कब शर्म है कब मर्द है?
खेल सिर्फ ताक़त का है, जो होना था अहसास का
सेवा मेरी, गर्म बिस्तर, जो मैं कहूं — ये मर्द है
निक्कर पहनकर रोड पर टहलता वो मर्द है
पर्दा जो थोड़ा कम हुआ तब मारता— ये मर्द है
प्रथम नियम स्त्री है स्त्री रहे— सुनो और क्या मर्द है
दो बेटियों के बाद भी बेटा मांगता— ये मर्द है
कितनी फंदे पर टंगी किसे पता क्या दर्द था?
फ़हरिश्त बनकर हक़ों की है मारता— ये मर्द है
सबको जो चाहिए था, बस वो मर्दों ने ले लिया
बंधन थे बच गए जो स्त्रियों को दे दिया— ये मर्द है
थाली लेकर छत पे रोटी खिलाती स्त्री से
नमक जो ज्यादा हुआ तब दहाड़ता— ये मर्द है
स्त्रियों के जो दुखों को समझे देखा मैंने मर्द नहीं
दुख में भी कोई लालसा जगाता— ये मर्द है
वहम कुछ ये भी—
उस मर्द के नए मर्द को रखो अब जुड़ा नहीं
स्त्री और पुरुष में कोई छोटा-बड़ा नहीं
और एक मानसिकता का बदलना ज़रूरी है
एक ही पायदान पर मर्द, स्त्री से बड़ा नहीं
नियमों की सूची को वो दिन भर रट रहीं
क्या ये जीती हैं ज़िंदगी? या बस इनकी कट रही
मधुर स्वर खन-खन को जो चूड़ियां पहनी हैं
उन्हीं चूड़ियों से ही हाथों की नलियां फट रहीं
अब कुछ ज़ुबाने उलटेंगी नारी के पिंजरे मत खोलो,
तुम बस कविता लिखो शब्दों से इनको मत तोलो— ये मर्द है
मर्दों की ख़िदमत के लिए बनी है ये स्त्री
"मर्दों पे उंगली के लिए नहीं है ये स्त्री"— ये मर्द है
कुछ मर्दों के शब्द मेरे कान में हैं गूंजते
"तुम क्या जानो दुनिया को, मुझसे क्यों नहीं पूछते"— ये मर्द है
एक वहम हर मर्द ने पाला होता है कभी,
पत्नी को पति की हर बात मान लेना सही— ये मर्द है
स्त्रियों को चाहिए कोई अब स्त्री सा ही हमसफ़र
नाकाम अब तक मर्द था, नाकाम अब तक— ये मर्द है
~ ख़्वाबी गौरव
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Kahiye janaab.!!